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टिहरी: ऋतुराज बसंत के आगमन व हिन्दू नववर्ष के शुभारंभ के अवसर पर उत्तराखंड में मनाया जाने वाला आठ दिवसीय प्राचीन लोक पर्व फूलदेई जगह जगह धूमधाम से मनाया गया।
आठ दिवसीय इस लोकपर्व का आज समापन हो जाएगा जिसके पश्चात बच्चे तहर तरह के पकवान बनाएंगे। आपको बताते चलें उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में खासतौर से मनाए जाने वाले लोकपर्व फूलदेई को हिंदी रीति रिवाजों के अनुसार हिन्दू नव व ऋतुराज बसंत के आगमन पर मनाया जाता है,
पर्व की मुख्य विशेषता
चैत्र संक्रांति के दिन सूर्योदय से पूर्व नन्हे नन्हे बच्चे ताजे ताजे फ्यूंली, बुरांस, आदि तमाम प्राकृतिक फूलों को अपने मंदिरों व घरों की देहरी पर डालते हैं।
फूलदेई का पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया। चैत्र मास में बच्चे घर की देहरी पर सुबह सवेरे लोकगीत गाते हुए फूल डालते हैं। पहाड़ों में कई स्थानों पर संक्रांति से लेकर अष्टमी (अठवाड) तक घर-घर फूल डालने की परंपरा हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह हिंदू नव वर्ष का पहला महीना है।
मान्यता है कि भगवान ब्रह्मा ने चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से ही संसार की रचना प्रारंभ की। पूजा पाठ के हिसाब से चैत्र मास का विशेष महत्व है। होलिका दहन से चैत्र मास की शुरुआत होती है। लोकगीत देवता फ्यूंली फूल, दे माई दाल चौंल, फूलदेई छम्मा देई द्वार, भर भंकार ये देली स बारंबार.., जिसका अर्थ है कि भगवान देहरी (द्वार) पर ये देवताओं के फूल सबकी रक्षा करें, समृद्धि दें।
टिहरी जनपद में भी इस पर्व को बड़े धूमधाम से मनाया गया, डागर पट्टी के मोरछांगा कोठार गांव की महिला मंगल दल अध्यक्ष सविता शाह ने बताया कि उत्तराखंड में हिन्दू मास की चैत्र सक्रांति को एक विशेष त्यौहार मनाया जाता है जो उस माह की विशेषता से जुड़ा होता है चैत्र मास के प्रथम दिन मनाया जाने वाला लोकपर्व फूलदेई ये त्यौहार बच्चों के द्वारा मनाया जाता है बच्चें सुबह सूर्योदय से पहले फूल डालते हैं आठ दिन तक बच्चें सुबह ही ताजे फूल निकालकर सबके घरों में डालते हैं और आठवे दिन जिसे हम अपनी गढ़वाली भाषा में बोलते हैं (अठवाड़ी )बच्चें एक डोली बनाते हैं जिसे घ्वागया देवता की डोली के नाम से जाना जाता है आठवें दिन बच्चें सबके घरों से चावल और गुड़ लेकर आते हैं छोले पूड़ी स्वाली पापड़ आदि चीजों को बनाते हैं और सर्वप्रथम डोली को भोग लगाकर पूजा करने के बाद फिर खा लेते हैं ।
आदर्श, बंधु, तनु, मोना, लक्कू, आरव, सोनाक्षी , यशु, संगम काना, रिशु आदि तमाम नन्हे मुन्ने बच्चों ने आठ दिवसीय इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया।
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