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वरिष्ठ पत्रकार ओंकार बहुगुणा बेबाक की कलम से:- उत्तराखंड की वादियों में जहां एक ओर प्रकृति का सौंदर्य बिखरा है, वहीं दूसरी ओर यहां के पहाड़ों की विषम परिस्थितियां जीवन को कठिन बना देती हैं। इन हालात में किसी का शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर बनना और फिर अपनी संस्कृति की विरासत को बचाने के लिए जुट जाना न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि हर किसी के लिए अनुकरणीय भी है। ऐसे ही सीमांत जनपद उत्तरकाशी के ज्ञानसु निवासी एक अद्वितीय व्यक्तित्व डॉक्टर केपी जोशी की कहानी है, जो पहाड़ की आत्मा को बचाने और संवारने का कार्य कर रहा है।
संघर्षों के बीच सफलता की कहानी
स्वर्गीय जयकृष्ण जोशी के घर में जन्मे डॉक्टर जोशी ने अपनी शुरुआती शिक्षा-दीक्षा पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में पूरी की हाई स्कूल करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए अपने पूफा जी स्वर्गीय पीताम्बर दत्त भट्ट के सानिध्य में आगे की पढ़ाई पूरी की ,न बिजली, न बेहतर साधन, फिर भी उन्होंने अपने दृढ़ निश्चय और मेहनत से डॉक्टर बनने का सपना साकार किया ओर कानपुर मेडिकल कालेज के टॉपर रहे बताते है कि मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें अमेरिका से ऑफर आया लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया और उत्तरकाशी में सेवा देने की इच्छा जताई और पूरे 16 सालों तक उत्तरकाशी जिला अस्पताल में मरीजों की सेवा की ये वो दौर था जब चिकित्सा के क्षेत्र में पूरा पहाड़ पिछड़ा हुआ था ऐसे में डॉक्टर ने संजीवनी का काम किया । मगर यह उनका अंतिम लक्ष्य नहीं था। वे जानते थे कि शिक्षा और सफलता का असली उद्देश्य अपने समाज और संस्कृति के लिए कुछ करना है।
रेडक्रास के चेयरमैन डॉक्टर जोशी के भाई माधव जोशी बताते है कि जब डॉक्टर जोशी पूफा जी के साथ आगे की पढ़ाई कर रहे थे तो किराए के मकान में रहते थे जब कीचन की लाइट खुली होती थी तो मकान मालिक उलाहने देता था कि हमारा लाइट का बिल ज्यादा आ रहा है ऐसे में अभिभावक के तौर पर पुफ़ जी मकान मालिक की इन उलाहनाओं को भी सहन करते थे लेकिन अपने भतीजे को आगे बढ़ाने के लिए हर प्रयास करते थे ।
पहाड़ की संस्कृति बचाने की मुहिम
डॉक्टर बनने के बाद जब वे अपनी जड़ों की ओर लौटे,तो उन्होंने उत्तरकाशी जिला मुख्यालय के जिला चिकित्सालय में ही अपनी तैनाती कराई और लंबे समय तक लोगों की सेवा की इसके बाद सेवानिवृति के पश्चात उन्होंने देखा कि आधुनिकता के प्रभाव में पहाड़ की लोक संस्कृति, गीत-संगीत और पारंपरिक वाद्य यंत्र विलुप्ति की कगार पर हैं। यह उनकी आत्मा को झकझोर गया। तभी उन्होंने ठाना कि वे अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करेंगे और इसे नई पीढ़ी के लिए सहेजेंगे।
उन्होंने उत्तराखंड लोक विरासत जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत की। हर साल यह मंच उन लोक गायकों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के वादकों को समर्पित होता है, जो वर्षों से अपनी कला को संजोए हुए हैं। इस मंच पर कलाकारों को न केवल अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है, बल्कि उनकी कला को सराहा और सम्मानित भी किया जाता है।
लोक कलाकारों को नई पहचान
लोक गायकों और वाद्य यंत्रों के कलाकार, जो गुमनामी में खो गए थे, अब इस मंच के माध्यम से नई पहचान पा रहे हैं। यह कार्यक्रम न केवल उनके लिए सम्मान की बात है, बल्कि उनकी कला को पुनर्जीवित करने का माध्यम भी बन रहा है। युवाओं में भी इस मंच के जरिए अपनी संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ी है।
हर किसी के लिए प्रेरणा
इस व्यक्तित्व की कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपनी संस्कृति और समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं। इन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर दिल में जुनून हो, तो कोई भी बदलाव लाया जा सकता है।
आज हर कोई इस अद्वितीय व्यक्तित्व को सलाम करता है, जो न केवल डॉक्टर हैं, बल्कि अपनी धरती, अपनी संस्कृति, और अपने लोगों के असली सेवक भी हैं। यह व्यक्ति उत्तराखंड के उन पहाड़ों की तरह है, जो हर तूफान के बाद भी अडिग खड़े रहते हैं। उनकी यह यात्रा बताती है कि अपने जड़ों से जुड़कर ही इंसान अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को बचा सकता है, ऐसे कर्मयोगी को हमारा नमन!
देहरादून: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रदेश के जनहित में विभिन्न महानुभावों को महत्वपूर्ण विभागीय दायित्व सौंपे हैं। इन दायित्वों के माध्यम से राज्य में जन कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी ल...